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क्या वाकई महिलाओं के खिलाफ है मनुस्मृति? हां, तो कैसे?

हाल में भाजपा (BJP) जॉइन करने वाली पूर्व अभिनेत्री खुश्बू सुंदर के स्टैंड को लेकर मनुस्मृति पर बहस (Debate on Manusmriti) छिड़ गई है. क्या वाकई मनुस्मृति महिलाओं के खिलाफ कोई व्यवस्था या संदेश देती है? क्या महिलाओं को इसका विरोध करना चाहिए? इस तर​ह के कई प्रश्न खड़े हुए हैं और खास तौर से महिला सशक्तिकरण (Woman Empowerment) के मोर्चों पर काम कर रहे लोग इस बहस और विरोध से जुड़ रहे हैं. मनुस्मृति को मानव धर्म शास्त्र (Religious Literature) माना जाता है, जिसके आधार पर अंग्रेज़ों ने हिंदू कानून (Hindu Society Law) तय किए थे.

यह भी एक फैक्ट दिया जाता है कि समाज, रिश्तों और व्यवस्था से जुड़े कुछ और पहलुओं पर प्राचीन सामाजिक नियम कायदे बताने वाले ग्रंथ मनुस्मृति को अब भी पंचायतों के निर्णयों में इस्तेमाल किया जाता है. कोर्ट भी कुछ प्रसंगों में इसका उल्लेख कर चुके हैं. हालांकि महिलाओं और जाति को लेकर मनु के ये नियम ‘मनुवादी’ सोच जैसा मुहावरा गढ़ते हैं. विचारक पेरियार भी ‘महिलाओं को सिर्फ वेश्या’ मानने वाला ग्रंथ बता चुके हैं.

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क्या 21वीं सदी में किसी ऐसे ग्रेथ की ज़रूरत या प्रासंगिकता बनती है, जो महिलाओं की स्थिति को अमानवीय नज़रिये से रेखांकित करे? इस तरह की बहस भी चलती रही है. बहरहाल, हम यहां मनुस्मृति की चर्चा इस संदर्भ में करेंगे कि क्यों महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं.

पिछले दिनों बीजेपी जॉइन करने वाली अभिनेत्री खुश्बू सुंदर ने मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति के पक्ष में स्टैंड लिया.

1. महिलाओं को संभालना चाहिए!
मनुस्मृति का 15वां कायदा कुछ इस तरह है ‘पुरुषों के प्रति चाहत, जल्दी बदल जाने वाले मन और स्वाभाविक हृदयहीनता के कारण अपने पति के प्रति महिलाएं दगाबाज़ हो सकती हैं इसलिए उन्हें बेहद संभालकर या निगरानी में रखना चाहिए.’ 9वें अध्याय में यह ग्रंथ ‘साथ या अलग रहने’ पर पति और पत्नी के कर्तव्य भी बताता है.

ऐतराज़ : क्या महिलाएं गुलाम हैं? या कोई वस्तु हैं, जिन पर हमेशा निगरानी रखना चाहिए? यह समाज में महिलाओं के विकास और सशक्तिकरण के विपरीत सिद्धांत है.

2. महिलाएं उत्तेजित करती हैं!
मनु ने दूसरे अध्याय में लिखा है कि ‘महिलाओं का स्वभाव ही पुरुषों को उत्तेजित करना और बहकाना है इसलिए जो समझदार हैं, वो महिलाओं के सान्निध्य में संभलकर रहते हैं और होश से काम लेते हैं.’

ऐतराज़ : यह और इस तरह के नियम समाज को प्रगतिशील सोच रखने से रोकते हैं इसलिए ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की​ स्थिति और भी दयनीय दिखती है. महिलाओं को केवल सेक्स संबंधों या वस्तु की चीज़ के तौर पर देखना पुरुषवादी विकृति और समाज के लिए खतरे के तौर पर देखा जाना चाहिए.

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3. महि​लाओं का बहिष्कार!
मनुस्मृति में केवल महिलाओं के लिए नियम निर्धारित किए जाने की बात कही जाती है, पुरुषों को सज़ा देने की बात न के बराबर है. ऐसा ही एक मनु नियम कहता है ‘जो महिला अपने पति की बेइज़्ज़ती करे, किसी व्यभिचार में लिप्त हो, शराबी हो या बीमार हो, तो उसे तीन महीने के लिए अकेला छोड़ देना चाहिए और उसके गहने व सुख सुविधाएं छीन लेना चाहिए.’

ऐतराज़ : इसे भेदभाव वाले रवैये के तौर पर समझना चाहिए. पति या पुरुष के शराबी या चरित्रहीन होने पर मनुस्मृति कोई दंड नहीं देती, लेकिन महिला के लिए कठोर बहिष्कार का नियम क्रूर पुरुषवादी नज़रिया है.

4. महिला मनुष्य नहीं है?
ग्रंथ के तीसरे अध्याय में उल्लेख है कि ‘जब ब्राह्मण भोजन कर रहे हों, उस समय उन्हें किसी सूअर, मुर्गे, कुत्ते, हिजड़े या किसी रजस्वला महिला को देखना भी नहीं चाहिए.’

ऐतराज़ : ऐसे ही मनुवादी नियम कायदों और नज़रियों के चलते आज तक मासिक धर्म को एक अशुद्धि या अभिशाप के तौर पर समझा जाता है. 21वीं सदी में भी महिलाएं इस प्राकृतिक क्रिया के कारण दुख, अपमान और बहिष्कार झेलने पर मजबूर हैं.

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न्यूज़18 क्रिएटिव

5. महिलाओं के लिए पैमाना!
तीसरे अध्याय में यह भी उल्लेख है कि ‘ऐसी महिला से विवाह नहीं करना चाहिए जिसे बाल या आंखें लाल हों, कोई अतिरिक्त अंग हो, जो अक्सर अस्वस्थ रहे, बाल न हों या ज़्यादा हों… जिसका नाम तारामंडल, पेड़, नदी, पर्वत, पक्षी, सांप, गुलाम या आतंकित करने वाले अर्थ के संकेत पर हो या वह नीची जाति की हो.’ साथ ही, ये भी कहा गया है कि समझदार लोग अच्छे परिवारों की, सुंदर और आकर्षक महिला से शादी करते हैं.

ऐतराज़ : अमानवीयता है. पुरुष के सौंदर्य या गुणों को लेकर कोई बात नहीं है, यहां भी सिर्फ महिलाओं के चयन को लेकर नियम हैं. महिला को तो चयन का अधिकार दिया ही नहीं गया, दूसरे इसे सामाजिक आदर्श के तौर पर ऐसे स्थापित किया गया कि महिला के जीवन के केंद्र में सौंदर्य ही रह गया, गुण या प्रतिभा नहीं.

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क्यों भड़का है विवाद?
पिछले दिनों एक वेबिनार में वीसीके पार्टी के प्रमुख थिरुमवलन ने पेरियार के विचारों को कोट करते हुए ‘मनुस्मृति को महिलाओं के खिलाफ’ बताया और यहां तक कहा कि यह ग्रंथ ‘महिलाओं को वेश्या से ज़्यादा कुछ मानता ही नहीं’ है. इसके पीछे मनुस्मृति के उन श्लोकों का हवाला दिया गया, जिनमें यह बात कही गई है. प्रतिक्रिया यह हुई कि इसी महीने भाजपा में शामिल हुईं खुश्बू सुंदर ने थिरुमवलन की बात का विरोध किया.

खुश्बू ने दावा किया कि मनुस्मृति महिलाओं को कतई तुच्छ समझने वाला ग्रंथ नहीं है. यही नहीं, खुश्बू ने इसे 17वीं सदी का ग्रंथ भी बता दिया जबकि इसे करीब दो हज़ार साल पुराना ग्रंथ माना जाता है और 18वीं सदी में एक अंग्रेज़ ने पहली बार इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया था, जिसके आधार पर भारत में समाज व्यवस्था के लिए हिंदू लॉ तय किए गए थे. इंटरनेट पर मनुस्मृति ग्रंथ पढ़ा जा सकता है.




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