मप्र तड़का

छत्तीसगढ़ी व्यंग्य – आफिस म कोरोना के बिसराम काल 

एला चाहो त सरकारी मन्दिर घलो समझ सकत हो.

अफसर मन ल बुढ़ापा नइ बियापे. जस-जस बुढ़ापा आथे तस-तस जवानी झूमथे. सरकार के लेवना (नवनीत-लेपन) लगा के रिटायर होय के बाद फेर पावर आ जथें. ओहदा म अधिकारी के फेर शोभा बन जथें. बिन पावर रहे नइ जाय. जनता के मन मड़ाय बर अफसर मन ल घलो जनता के सेवक कहे के मुहावरा सुने जथे. सेवक बने के बाद अधिकारी जनता के स्वामी बन जथें.

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    November 26, 2020, 6:14 PM IST

खबरीलाल सरकारी आफिस के ताना-बाना ल देख के भीतरे-भीतर गुंगवावत हे. आफिस ले लहुटत बेरा ओला लालबुझक्कड़ मिलगे.जोंन जिला कार्यालय तिर मदारी के बेंदरा नाच देख के लहुटत रिहिस. खबरीलाल पूछिस-‘तेंहा कइसे बड़े कार्यालय के आसपास भटकत हस?’ लालबुझक्कड़ हँसी मजाक म किहिस-‘आम-आदमी बड़े-बड़े कार्यालय के बाहिरेच म मिल सकत हे. मेंहा बेंदरा–नाच के मजा लेवत रेहेंव.मोला मदारी म नेता अउ बेंदरा म आम-आदमी के दरसन होवत रिहिस. हम सोचेंन चल अपने उपर हँस ले जाय.’

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें- ता – गोता अउ दया-मया के करतेन मरदम सुमारी का होगे ममियारो ला
कोरोनाका : आफिस के बिसराम काल
खबरीलाल किहिस-‘बने काहत हस रे,भई. हमन बेंदरा कस ये आफिस ले वो आफिस नाचत-नाचत थक गें हन.एक ठन बुता नइ होवत हे. सब कथें कोरोनाकाल हे.सरकारी आफिस जनता ल देखाय के जीनिस होगे हे. एला चाहो त सरकारी मन्दिर घलो समझ सकत हो. देवता बरोबर इहाँ बड़े-बड़े अधिकारी होथें.लोकतंत्र के ये वरदानी आंय. भीड़ म इहाँ कोनो कखरो सुख-दुःख के सुनइया नइ मिलें सज्जन किसम के कोनो अधिकारी तुंहर सुन लिस त अहो! भाग.ये मन छोटे-मोटे बुता नइ करें,बड़े बुता करथें.जनता के भलई के कागज आवत-जात रहिथे. अब त कागज घलो नइ दिखे,सबे आफिस म कम्प्यूटर हे,इंटरनेट हे. कागज के बिना सरकार चलत हे.चलत–चलत पांच साल कइसे बीत जथे जनाबे नइ करे .’सरग के रद्दा कस
अतका म शेखचिल्ली आ धमकिस.शेखचिल्ली किहिस-‘संगी कतको झन इहाँ के करमचारी मन मोला दान के डब्बा कस जनाथे.कतको झन काम करे म लगे रहिथें.उनर काम वो जानें.जेकर मुखड़ा खिले–खिले दिखे त जान लेव के ओ ह आफिस के तपस्वी मनखे आय. ओखर मुड़ के बाल आधा करिया-आधा सफेद दिखे त समझ लेव के वो सेवकराम आय,सेवा लेव.ये अनुभवी परानी (प्राणी) साहेब तक पहुंचे-पहुंचाय के रद्दा ल जानथे.जानो-मानो सरग के रद्दा होय .’

आफिस के रीत-नीत
लालबुझक्कड़ गंभीर हो के किहिस –‘ये आम आदमी होना घलो बड़ पाप हे,भइया.आम-आदमी मतलब कीरा मकोरा.सब जगा रमजाने वाला,पीसाने वाला.अउ ख़ास-आदमी हम हो नइ सकन. जनता के समस्या हल करे बर साहेबजी मन अपन कुरसी म कभू-कभू विराजथें.कोनो बाबू आय हे.कोनो अपन घरे ले आफिस चलात हे. कोनो बिना आवेदन गोल हें.कोनो कोरोना छुट्टी म हे.कखरो साहेब से बने पटथे त ओखर गैरहाजिरी ह हाजिरी मान ले जथे.कोनो कोनो ल छोड़ के सब्बो आफिस के भूगोल, इतिहास अउ पर्यावरण करीब-करीब अइसने होथे.बाबू बिना आफिस के शोभा कहाँ? बीच म शेखचिल्ली बोल परिस किहिस–‘ हर आफिस म कोरोना के डर नाचत हे.ओखर डर म आफिस-आफिस दुबरावत हें.महामारी आफिस के सुंदर व्यवस्था ल देख के खुद सेनेटाइज हो जथे.सब बर मास्क लगाना जरूरी हे फेर कोनो परवाह करथें, कोनो ल कखरो फ़िकर नइ हे.खुद संकट म अउ आफिस घलो संकट म.आफिस सेनेटाइज करे के सुख-दुःख अलगेच हे.’

बड़े बाबू शेडो अफसर
खबरीलाल किहिस-‘कतको साहेबजी मन के आत्मा आफिस ले बाहिर भटकतथे. मनखे के चिन्हारी करथे . कोन काम के आय अउ कोन बेकाम.कोरोनाकाल म जेन अफसर दुसर शहर ले आफिस आथे तेंन हाजिर होगे त बड़े बात होथे.आफिस धन्य हो जथे.जतका बड़े अफसर वोखर ओतके बड़े जवाबदारी होथे.आफिस चलत–फिरत दिखना चाही.नेता मन के काम करना प्रथम कर्तव्य होथे.नेता खुश त अधिकारी सही हे.आफिस के बड़े बाबू ल अफसर के गैरहाजिरी म अफसर बरोबर पावर वाले जाने मा बुद्धिमानी हे. बड़े बाबू ल साक्षात् शेडो अफसर जानो.आफिस अपन रंग –ढंग ले चलथे.हर आफिस के चाल–चलन जनता बर उन्नइस-बीस होथे.’

साहेब मन के बइठका
शेखचिल्ली किहिस-‘अफसर बइठका के लोकतंत्र म बड़ महत्व हे.हपता के तीन–चार दिन अधिकारी मन के बइठका म खप जथे.जब आम-जनता ल अफसर के कुरसी खाली दिखते तब जवाब मिलथे साहेब बइठका म गे हें.साहेब घर म हे तभो ले जवाब हे बइठका म हें. साहेब के दरसन होना कोनो बड़े पुन्न के फल के बरोबर होथे .’

लालबुझक्कड़ किहिस-‘अफसर मन ल बुढ़ापा नइ बियापे.जस-जस बुढ़ापा आथे तस-तस जवानी झूमथे. सरकार के लेवना(नवनीत-लेपन)लगा के रिटायर होय के बाद फेर पावर आ जथें.ओहदा म अधिकारी के फेर शोभा बन जथें.बिन पावर रहे नइ जाय.आख़िरी साँस तक कुरसी चाही.जनता के मन मड़ाय बर अफसर मन ल घलो जनता के सेवक कहे के मुहावरा सुने जथे.सेवक बने के बाद अधिकारी जनता के स्वामी बन जथें.’

आफिस के गुफा
लालबुझक्कड़ किहिस-‘अफसरी माया म लोकतंत्र जकड़े हे. हर सरकार के जन-जन तक पहुंचे के नारा हे. नारा ले नेतागिरी के फसल हरियाथे.अ फसर मन बड़ चतुरा होथें. नेता मन ल मोह डरथें. सरकार के आना-जाना लगे रहिथे. कोरोनाकाल माने आफिस म अघोषित बिसराम-काल चलत हे, प्रदेश, संभाग, जिला के आफिस त बड़े-बड़े हे फेर कामकाज लगभग जीरो हे. जनता के समस्या खड़े-खड़े मनखे खिल्ली उड़ावत हें.सियान अधिकारी आफिस अउ जनता उपर गरू हें.बस तारीख दउड़त हे. तारीख सुंदर-सुंदर गेंड़ी म रचरचावत हे.आफिस के गुफा म तारीख देवइया बइथे हें. जनता के भगवान मालिक हे.प्रदेश फेर कोरोना अभिनन्दन डाहर बढत हे .




Source link

Tags

Related Articles

Back to top button
Close